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  • जैन दर्शन - विकिपीडिया
    जैन दर्शन सबसे प्राचीन भारतीय दर्शन में से एक है। इसमें अहिंसा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जैन धर्म की मान्यता अनुसार 24 तीर्थंकर
  • जैन दर्शन और उसका उद्देश्य - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर
    आचार का नाम धर्म है और विचार का नाम दर्शन है तथा युक्ति-प्रतियुक्ति रूप हेतु आदि से उस विचार को सुदृढ़ करना न्याय है।
  • जैन धर्म का इतिहास, प्रसार, दर्शन, सम्प्रदाय और सिद्धांत
    जैन धर्म एक प्राचीन धर्म है यह अहिंसा और आत्म-संयम के माध्यम से आध्यात्मिक शुद्धता और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग सिखाता है
  • जैन दर्शन - encyclopediaofjainism. com
    जीव को संसार में परिभ्रमण कराने का कारण कर्म है। इसे प्रकृति, शील और स्वभाव भी कहते हैं। इस जीव और कर्म का अनादिकाल से संबंध चला आ रहा है। जैसे कि सुवर्ण पाषाण में किट्ट और कालिमा का मिश्रण प्रारंभ से ही रहता है। इस जीव और कर्मों का अस्तित्व स्वत: सिद्ध है।१ ‘‘अहं’’ प्रत्यय से-‘‘मैं खाता हूँ, मैं सोता हूँ,’’ इत्यादि ज्ञान से जीव का अस्तित्व जाना जाता है और दीन, दरिद्री, धनी आदि होने से कर्म का अस्तित्व प्रसिद्ध है।
  • तत्त्व मीमांसा -जैन दर्शन - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर
    जैन दर्शन में तत्त्व का अर्थ है प्रयोजन भूत वस्तु। जो अपने मतलब की वस्तु है और जिससे अपना हित अथवा स्वरूप पहचाना जाता है वह तत्त्व है
  • जैन दर्शन की विकास यात्रा
    जैन दर्शन सम्बन्धी विचारों अथवा साहित्य के विकासक्रम को विद्वानों ने मुख्य रूप से चार-पाँच भागों में विभाजित किया है। जिसे इस
  • [Solved] जैन दर्शन के अनुसार तत्त्व के लक्षण है
    जैन धर्म में सात तत्व (Reality): सात मौलिक सिद्धांत हैं: जीव (आत्मा), अजीव (गैर-आत्मा), आस्रव (प्रवाह), बंध (बंधन), संवर (अवरोध), निर्जरा (क्रमिक
  • eGyanKosh: इकाई-5 जैन दर्शन: परिचय एवं प्रमुख सिद्धान्त
    Please use this identifier to cite or link to this item: http: egyankosh ac in handle 123456789 99224
  • जैन दर्शन का तत्त्वार्थ सिद्धांत और विज्ञान | UPSC Mains PHILOSOPHY . . .
    जैन दर्शन, भारतीय दर्शन की एक प्राचीन शाखा है, जो अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों पर आधारित है। 'तत्त्वार्थ' सिद्धांत
  • जैन दर्शन - जैनकोष
    सम्यग्ज्ञान ही प्रमाण है। वह दो प्रकार है–प्रत्यक्ष व परोक्ष। प्रत्यक्ष भी दो प्रकार है–सांव्यवहारिक व पारमार्थिक। इंद्रिय ज्ञान सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष है और अवधि, मन:पर्यय व केवलज्ञान पारमार्थिक प्रत्यक्ष। तिनमें भी अवधि व मन:पर्यय विकल प्रत्यक्ष है और केवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष। यह ज्ञान क्षीणकर्मा अर्हंत और सिद्धों को ही होता है। सत् उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक होने से प्रत्येक पदार्थ अनंतधर्मात्म है, जो प्रमाण व नय के द्वारा भली भाँति जाना जाता है। प्रमाण के अशं को नय कहते हैं, वह वस्तु के एकदेश या एकधर्म को जानता है। बिना नय विवक्षा के वस्तु का सम्यक् प्रकार निर्णय होना संभव नहीं है। (तत्त्वार्थ सूत्र); (षट् दर्शन समुच्चय 45-58 39-62)।





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